
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथाविपरीतफलकारणाविपरीतकारणसमुपासनप्रवृत्तिं सामान्यविशेषतो विधेयतया सूत्रद्वैतेनोपदर्शयति - श्रमणानामात्मविशुद्धिहेतौ प्रकृते वस्तुनि तदनुकूलक्रियाप्रवृत्त्या गुणातिशयाधानमप्रति-षिद्धम् ॥२६१॥ अब, अविपरीत फल का कारण ऐसा जो 'अविपरीत कारण' उसकी उपासनारूप प्रवृत्तिसामान्य और विशेषरूप से करने योग्य है ऐसा दो सूत्रों द्वारा बतलाते हैं - यदि कोई श्रमण अन्य श्रमण को देखे तो प्रथम ही, मानो वे अन्य श्रमण गुणातिशयवान् हों इस प्रकार उनके प्रति (अभ्युत्थानादि) व्यवहार करना चाहिये । फिर उनका परिचय होने के बाद उनके गुणानुसार बर्ताव करना चाहिये ॥२६१॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथाभ्यागततपोधनस्यदिनत्रयपर्यन्तं सामान्यप्रतिपत्तिं, तदनन्तरं विशेषप्रतिपत्तिं दर्शयति -- वट्टदु वर्तताम् । स कः । अत्रत्य आचार्यः । किं कृत्वा । दिट्ठा दृष्टवा । किम् । वत्थुं तपोधनभूतं पात्रं वस्तु । किंविशिष्टम् । पगदं प्रकृतंअभ्यन्तरनिरुपरागशुद्धात्मभावनाज्ञापकबहिरङ्गनिर्ग्रन्थनिर्विकाररूपम् । काभिः कृत्वा वर्तताम् । अब्भुट्ठाणप्पधाणकिरियाहिं अभ्यागतयोग्याचारविहिताभिरभ्युत्थानादिक्रियाभिः । तदो गुणादो ततो दिन-त्रयानन्तरं गुणाद्गुणविशेषात् विसेसिदव्वो तेन आचार्येण स तपोधनो रत्नत्रयभावनावृद्धिकारण-क्रियाभिर्विशेषितव्यः त्ति उवदेसो इत्युपदेशः सर्वज्ञगणधरदेवादीनामिति ॥२९९॥ [वट्टदु] वर्तें । वे कौन वर्तें ? यहाँ के आचार्य वर्तें । क्या करके वर्तें ? [दिट्ठा] वे देखकर वर्तें । किन्हें देखकर वर्तें? [वत्थुं] मुनिरूप पात्र वस्तु को देखकर वर्तें । किस विशेषता वाले मुनि को देखकर वर्तें? [पगदं] प्रकृत-अन्दर में वर्तने वाली उपराग (मलिनता) रहित शुद्धात्मा की भावना को बतानेवाले बाहर के निर्ग्रंन्थ, निर्विकार-विकार रहित दिगम्बर-रूप को देखकर वर्तें । किस रूप से वर्तें ? [अब्भुट्ठाणप्प्धाणकिरियाहिं] आये हुये मुनि के योग्य आचार-शास्त्र में कही गई अभ्युत्थान-सम्मानार्थ खडे होना-इत्यादि क्रियाओं रूप से वर्तें । [तदो गुणादो] फिर तीन दिन बाद गुणों से--गुणों की विशेषता से [विसेसिदव्वो] उन आचार्य को, उन मुनि के प्रति रत्नत्रयरूप भावना की वृद्धि की कारणभूत क्रियाओं द्वारा, विशेष करना चाहिये -- ऐसा सर्वज्ञ गणधरदेवादि का उपदेश है ॥२९९॥ |