
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ कीदृश: श्रमणाभासो भवतीत्याख्याति - आगमज्ञोऽपि, संयतोऽपि, तप:स्थोऽपि जिनोदितमनन्तार्थनिर्भरं विश्वं स्वेनात्मना ज्ञेयत्वेन निष्पीतत्वादात्मप्रधानमश्रद्दधान: श्रमणाभासो भवति ॥२६४॥ अब, कैसा जीव श्रमणाभास है सो कहते हैं :- आगम का ज्ञाता होने पर भी, संयत होने पर भी, तप में स्थित होने पर भी, जिनोक्त अनन्त पदार्थों से भरे हुए विश्व को—जो कि (विश्व) अपने आत्मा से ज्ञेयरूप से पिया जाता होने के कारण आत्मप्रधान है उसका—जो जीव श्रद्धान नहीं करता वह श्रमणाभास है ॥२६४॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ श्रमणाभासः कीदृशो भवतीति पृष्टे प्रत्युत्तरं ददाति -- ण हवदि समणो स श्रमणो न भवति त्ति मदो इति मतः सम्मतः । क्व । आगमे । कथंभूतोऽपि । संजमतवसुत्तसंपजुत्तो वि संयमतपःश्रुतैःसंप्रयुक्तोऽपि सहितोऽपि । यदि किम् । जदि सद्दहदि ण यदि चेन्मूढत्रयादिपञ्चविंशतिसम्यक्त्वमलसहितःसन् न श्रद्धत्ते, न रोचते, न मन्यते । कान् । अत्थे पदार्थान् । कथंभूतान् । आदपधाणे निर्दोषिपरमात्मप्रभृतीन् । पुनरपि कथंभूतान् । जिणक्खादे वीतरागसर्वज्ञजिनेश्वरेणाख्यातान्, दिव्य-ध्वनिना प्रणीतान्, गणधरदेवैर्ग्रन्थविरचितानित्यर्थः ॥३०३॥ [ण हवदि समणो] वह श्रमण नहीं है, [त्ति मदो] ऐसा माना गया है- स्वीकार किया गया है । ऐसा कहाँ माना गया है? ऐसा आगम में माना गया है । कैसा होने पर भी वह मुनि नहीं है? [संजमतवसुत्तसंपजुत्तो वि] संयम तप, श्रुत से सहित होने पर भी वह मुनि नहीं है । [जदि सद्दहदि ण] यदि सम्यक्त्व के तीन मूढ़ता आदि पच्चीस मल-दोषों सहित होता हुआ श्रद्धान नही करता है, रुचि नही करता है, मानता नहीं है, तो वह मुनि नहीं है । किनका श्रद्धान नहीं करता है? [अत्थे] पदार्थों का श्रद्धान नहीं करता है । कैसे पदार्थों का श्रद्धान नहीं करता है? [आदपधाणे] दोष रहित परमात्मा प्रधान पदार्थों का श्रद्धान नही करता है । और कैसे पदार्थों का श्रद्धान नहीं करता है? [जिणक्खादे] वीतराग-सर्वज्ञ जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रसिद्ध किये गये, दिव्यध्वनि द्वारा कहे गये, गणधर देवों द्वारा ग्रन्थों में लिखे गये, आत्मा-प्रधान पदार्थों का श्रद्धान नही करता है, तो मुनि नहीं है -- ऐसा अर्थ है ॥३०३॥ |