+ पर ज्ञान का कारण नहीं, निमित्त-मात्र होता है -
नाज्ञो विज्ञत्वमायाति, विज्ञो नाज्ञत्वमृच्छति
निमित्तमात्र-मन्यस्तु, गतेर्धर्मास्तिकायवत् ॥35॥
मूर्ख न ज्ञानी हो सके, ज्ञानी मूर्ख न होय
निमित्‍त मात्र पर जान, जिमि गति धर्मतें होय ॥३५॥
अन्वयार्थ : पर के कारण मूर्ख ज्ञानी नहीं हो सकता और ज्ञानी मूर्ख नहीं हो सकता । पर पदार्थ धर्मास्तिकाय के समान निमित्त-मात्र है ।
Meaning : It is not possible for the Truth to be acquired by those not qualified for its acquisition, and the knower of the Truth cannot become devoid of it. Teaching by others is an external facilitator just as the medium of motion (dharma) is to the movement of objects.

  आशाधरजी 

आशाधरजी : संस्कृत
अन्‍वय - अज्ञ: विज्ञत्‍वं न आयाति विज्ञ: अज्ञत्‍वं न ऋच्‍छति गतेर्धर्मास्तिकायवत् अन्‍यस्‍तु निमित्‍तमात्रम् ।
टीका - भद्र ! अज्ञस्‍तत्‍वज्ञानोत्‍पत्‍ययोग्‍योअभव्‍यादिर्विज्ञत्‍वं तत्त्वज्ञत्‍वं धर्माचार्याद्युपदेशसहस्‍त्रेणापि न गच्‍छति । तथा चोक्‍तम् --
'स्‍वाभाविकं हि निष्‍पत्‍तो, क्रियागुणमपेक्ष्‍यते । न व्‍यापारशतेनापि- शुकक्‍त्‍पाठयते वक:' ॥
तथा विज्ञस्‍तत्‍वज्ञानपरिणाते अज्ञत्‍वं तत्त्वज्ञानात्‍परिभ्रंशमुपायसहस्‍त्रेणापि न मच्‍छति । तथा चोक्‍तम् –
'वज्रे पतत्‍यपि भयद्रुतविश्‍वलोकमुक्‍ताध्‍वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात् ।
बोधप्रदीपहतमोहमहान्‍धकारा:, सम्‍यग्‍दृश: किमुत शेषपरीषहेषु' ॥६३॥
नन्‍वेवं बाह्यनिमित्‍तक्षेय: प्राप्‍नोतीत्‍यत्राह । अन्‍य पुनर्गुरूविपक्षादि: प्रकृतार्थसमुत्‍पादभ्रंशयोर्नि-मित्‍तमात्रं स्‍यात्‍तत्रयोग्‍यताया एव साक्षात्‍साधकत्‍वात् । कस्‍या: को यथेत्‍यत्राह, गतेरित्‍यादि । अयमर्थो- यथा युगपद्भाविगति-परिणामोन्‍मुखानां भावनां स्‍वकीया गतिशक्तिरेव गते: साक्षाज्‍जनिका तर्द्वकल्‍ये तस्‍या: सहकारिकारणमात्रं स्‍यादेवं प्रकृतेअपि अतो व्‍यवहारा देव गुर्वादे: शुश्रुषा प्रतिपत्‍तव्‍या । अथाह शिष्‍य: - अभ्‍यास: कथमिति । अभ्‍यासप्रयोगोपायप्रश्‍नोअयम् । अभ्‍यास: कथ्‍यत इति क्‍वचित्‍पाठ: । तत्राभ्‍यास: स्‍यात् भूयोभूय: प्रवृत्तिलक्षणत्‍वेन सुप्रसिद्धत्‍वातस्‍य स्‍थाननियमादिरूपेणेपदेश: क्रियत इत्‍यर्थ: । एवं संवित्तिरूच्‍यत इत्‍युत्‍तरपातनिकाया अपि व्‍याख्‍यानमेतत्‍पाठापेक्षया द्रव्‍यव्‍यम् । तथा च गुरोरेवैते वाक्‍ये व्‍याख्‍येये । शिष्‍यबोधार्थं गुरूराह- ॥३५॥


तत्त्वज्ञान की उत्‍पत्ति के अयोग्‍य अभव्‍य आदिक जीव, तत्त्वज्ञान को धर्माचार्यादिकों के हजारों उपदेशों से भी नहीं प्राप्‍त कर सकते हैं । जैसा कि कहा गया है -

'कोई भी प्रयत्‍न कार्य की उत्‍पत्ति करने के लिये स्‍वाभाविक गुण की अपेक्षा किया करता है । सैकड़ों व्‍यापारों से भी बगुला तोते की तरह नहीं पढ़ाया जा सकता है ।'

इसी तरह तत्त्वज्ञानी जीव, तत्त्वज्ञान से छूटकर हजारों उपायों के द्वारा भी अज्ञत्‍व को प्राप्‍त नहीं कर सकता । जैसा कि कहा गया है --

'जिसके कारण भय से घबराई हुई सारी दुनियाँ मार्ग को छोड़कर इधर-उधर भटकने लग जाय, ऐसे वज्र के गिरनेपर भी अतुल शांति-सम्‍पन्‍न योगिगण योग से (ध्‍यान से) चलायमान नहीं होते । तब ज्ञानरूपी प्रदीप से जिन्‍होंने मोहरूपी महान् अन्‍धकार को नष्‍ट कर दिया है, ऐसे सम्‍यग्‍दृष्टि जीव क्‍या शेष परीषहों के आनेपर चलायमान हो जायेंगे ? नहीं, वे कभी भी चलायमान नहीं हो सकते हैं ।'

यहाँ शंका यह होती है कि यों तो बाह्य निमित्‍तों का निराकरण ही हो जायेगा ? इसके विषय में जवाब यह है कि अन्‍य जो गुरू आदिक तथा शत्रु आदिक हैं, वे प्रकृत कार्य के उत्‍पादन में तथा विध्‍वंसन में सिर्फ निमित्‍तमात्र हैं । वास्‍तव में किसी कार्य के होने व बिगड़ने में उसकी योग्‍यता ही साक्षात् साधक होती है । जैसे एक साथ गतिरूप परिणाम के लिये सन्‍मुख हुए पदार्थों में गति को साक्षात् पैदा करनेवाली उन पदार्थों की ही गमन करने की शक्ति है । क्‍योंकि यदि पदार्थों में गमन करने की शक्ति न होवे तो उनमें किसी के द्वारा भी गति नहीं की जा सकती । धर्मास्तिकाय तो गति कराने में सहायकरूप द्रव्‍यविशेष है । इसलिये वह गति के लिये सहकारी कारणमात्र हुआ करता है । यही बात प्रकृत में भी जाननी चाहिये । इसलिये व्‍यवहार से ही गुरू आदिकों की सेवा शुश्रूषा आदि की जानी चाहिये ॥३५॥

अब शिष्‍य कहता है कि 'अभ्‍यास कैसे किया जाता है ?' इसमें अभ्‍यास करने के उपायों को पूछा गया है । सो अभ्‍यास और उसके उपायों को कहते हैं । बार-बार प्रवृत्ति करने को अभ्‍यास कहते हैं । यह बात तो भलीभाँति प्रसिद्ध ही है । उसके लिये स्‍थान कैसा होना चाहिए ? कैसे नियमादि रखने चाहिये ? इत्‍यादि रूपसे उसका उपदेश किया जाता है । इसी प्रकार साथ में संवित्ति का भी वर्णन करते हैं ।