
आशाधरजी : संस्कृत
अन्वय - अगच्छन् तद्विशेषाणां अनभिज्ञश्च जायते अज्ञाततद्विशेषस्तु न बध्यते, विमुच्यते । टीका - स्वात्मतत्त्वनिष्टोअन्यत्र अगच्छन्नप्रवर्तमानस्तस्य स्वात्मनाअन्यस्य देहादविशेषाणां सौनदर्यासौन्दर्यादिवर्माणामनभिज्ञ आभिमुख्येनाप्रतिपत्ता च भवति । अज्ञाततद्विशेष: पुनस्तत्राजायमान—रागद्वेषत्वात्कर्मभिर्न बध्यते । किं तर्हि ! विशेषण वताद्यनुष्ठातृभ्योअतिरेकेण तैर्मुच्यते । किं च ॥४४॥ स्वात्मतत्त्व में स्थिर हुआ योगी जब अध्यात्म से भिन्न दूसरी जगह प्रवृत्ति नहीं करता, तब उस स्वात्मा से भिन्न शरीरादिक के सौन्दर्य-असौन्दर्य आदि विशेषों से अनभिज्ञ हो जाता है और उनकी विशेषताओं पर ख्याल नहीं करता, तब उनमें राग-द्वेष पैदा न होने के कारण कर्मों से बंधता नहीं है, किन्तु व्रतादिक का आचरण करनेवालों की अपेक्षा भी कर्मों से ज्यादा छूटता है ॥४४॥ और भी कहते हैं -- |