
आशाधरजी : संस्कृत
अन्वय - आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य व्यवहारबहि: स्थिते: योगिन: योगेन कश्चित् परमानंदो जायते । टीका - आत्मानोअनुष्ठानं देहादेर्व्यावर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापनं तत्परस्य व्यवहारात्प्रवत्तिनिवृति-लक्षणाद्वहि:स्थिते बाह्यस्य योगिनो ध्यातुर्योगेन स्वात्मध्यानेन हेतुना कश्चित् वाचामगोचर: परमोअनन्यसंभवी आनंद: उत्पद्यते । तत्कार्यमुच्यते - ॥४७॥ देहादिक से हटकर अपने आत्मा में स्थित रहनेवाले तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति-लक्षणवाले व्यवहार से बाहर दूर रहनेवाले ध्यानी योगी पुरुष को आत्म-ध्यान करने से कोई एक वचनों के अगोचर परम जो दूसरों को नहीं हो सकता ऐसा आनंद उत्पन्न होता है ॥४७॥ उस आनंद के कार्य को बताते हैं -- |