
आशाधरजी : संस्कृत
अन्वय - अविद्याभिदुरं महत् परं ज्ञानमयं ज्योति: मुमुक्षुभि: तत् प्रष्टव्यं तत् एष्टव्यं तद् द्रष्टव्यम् । टीका - तदानंदस्वभावं ज्ञानमयं स्वार्थावभासात्मकं परमुत्कृष्टविद्याभिदुरं विभ्रमच्छेदकं महत् विपुलम् इन्द्रादीनां पूज्यं वा ज्योति:प्रष्टव्यं मुमुक्षुभिर्गुवादिभ्योअनुयोक्तव्यम् । तथा तदेव एष्टव्यं अभिलषणीयं तदेव च द्रष्टव्यमनुभवनीयम् । एवं व्युत्पाद्य विस्तरतो व्युत्पाद्य उक्तार्थतस्वं परमकरूणया संगृह्रा तन्मनसि संस्थापयितुकाम सूरिरिदमाह किं बहुनेति । हे पुमते कि कार्य बहुनोक्केन हेयोपादेययतत्त्वयो: संक्षेपेणापि प्राज्ञचेतसि निवेशयितुं शक्यत्वाक्षिति भाव: ॥४९॥ वह आनंद स्वभावशाली, महान् उत्कृष्ट, विभ्रम को नष्ट करनेवाली, स्वार्थ को प्रकाशन करनेवाली, अथवा इन्द्रादि कों के द्वारा पूज्य ऐसी ज्योति है । मोक्ष की इच्छा रखनेवालों को चाहिये कि वे गुरू आदिकों से उसी के विषय में पूछ-ताछ करें तथा उसी को चाहें एवं उसी का अनुभव करें ॥४९॥ इस प्रकार शिष्य को विस्तार के साथ समझाकर आचार्य अब परम करूणा से उस कहे हुए अर्थ-स्वरूप को संक्षेप के साथ शिष्य के मन में बैठाने की इच्छा से कहते हैं कि 'हे सुमते-अच्छी बुद्धिवाले ! बहुत कहने से क्या ? हेय-उपादेय तत्वों को संक्षेप में भी बुद्धिमानों के ह्रदयों में उतारा जा सकता है । उन्हें साररूप में बतलाया जा सकता है ।' |