+ आत्मा को निर्मल देख -
जेम सहाविं णिम्मलउ फलिहउ तेम सहाउ ।
भंतिए मइलु म मण्णि जिय मइलउ देक्खवि काउ ॥177॥
यथा स्वभावेन निर्मलः स्फटिकः तथा स्वभावः ।
भ्रान्त्या मलिनं मा मन्यस्व जीव मलिनं द्रष्ट्वा कायम् ॥१७७॥
अन्वयार्थ : [यथा] जैसे [स्फटिकः] स्फटिक-मणि [स्वभावेन] स्वभाव से [निर्मलः] निर्मल है, [तथा] उसी तरह [स्वभावः] (आत्मा का ज्ञान दर्शनरूप) स्वभाव है [जीव] हे जीव ! [कायम् मलिनं] शरीर को मलिन [दृष्ट्वा] देखकर [भ्रांत्या] भ्रम से (स्वभाव को) [मलिनं] मैला [मा मन्यस्व] मत मान ।
Meaning : As Sphatika-Mani is pure without any dirt or adulteration so is the Atman; seeing thy body dirty, do not regard thy Atman to be the same.

  श्रीब्रह्मदेव