+ अन्त-मंगल -
परम-पय-गयाणं भासओ दिव्व-काओ
मणसि मुणिवराणं मुक्खदो दिव्व-जोओ
विसय-सुह-रयाणं दुल्लहो जो हु लोए
जयउ सिव-सरूवो केवलो को वि बोहो ॥214॥
परमपदगतानां भासको दिव्यकायः
मनसि मुनिवराणां मोक्षदो दिव्ययोगः ।
विषयसुखरतानां दुर्लभो यो हि लोके
जयतु शिवस्वरूपः केवलः कोऽपि बोधः ॥२१४॥
अन्वयार्थ : [दिव्यकायः] दिव्य (ज्ञान आनंदरूप) शरीरी, [परमपदगतानां भासकः] परम-पद-प्राप्त के उपासक [जयतु] जयवंत हो । [मुनिवराणां] महामुनि के [मनसि] मन में [दिव्ययोगः] वीतराग निर्विकल्प-समाधिरूप योग [मोक्षदः] मोक्ष का देनेवाला है; [केवलः कोऽपि बोधः] जिसका केवलज्ञान स्वभाव है, ऐसी अपूर्व ज्ञानज्योति [शिवस्वरूपः] सदा कल्याणरूप है; [लोके] लोक में [विषयसुखरतानां] इन्द्रियों के विषय में आसक्त को [यः हि] जो (परमात्म-तत्त्व) [दुर्लभः] महा दुर्लभ है ।

  श्रीब्रह्मदेव