
घातिकर्मक्षयोत्पन्नं यद्रूपं परमात्मन: ।
श्रद्धत्ते भक्तितो भव्यो नाभव्यो भववर्धक: ॥31॥
अन्वयार्थ : परमात्मनः घातिकर्मक्षयोत्पन्नं यद् रूपं भव्यः भक्तितः श्रद्धत्ते भववर्धकः अभव्यः न ।
घाति कर्मों के क्षय से उत्पन्न हुये परमात्मा के जिस स्वरूप का भव्यात्मा भक्ति से श्रद्धान करता है; अभव्य जीव उसका श्रद्धान नहीं करता; क्योंकि वह अभव्य जीव स्वभाव से भववर्धक होता है ।