
आत्मा स्वात्मविचारज्ञैर्नीरागीभूतचेतनै: ।
निरवद्यश्रुतेनापि केवलेनेव बुध्यते ॥34॥
अन्वयार्थ : स्व-आत्म-विचारज्ञै: नीरागीभूतचेतनै: निरवद्यश्रुतेन अपि आत्मा केवलेन इव बुध्यते ।
निज आत्मा के विचार में निपुण रागरहित जीव निर्दोष श्रुतज्ञान से भी आत्मा को केवलज्ञान के समान जानते हैं ।