
य: करोति परद्रव्ये रागमात्मपरांमुख: ।
रत्नत्रयमयो नासौ न चारित्रचरो यति: ॥39॥
अन्वयार्थ : य: यति: आत्म-परांमुख: परद्रव्ये रागं करोति असौ न रत्नत्रयमय: न चारित्रचर: ।
जो योगी आत्मस्वभाव से विमुख होकर परद्रव्य में राग/प्रीति करता है, वह योगी न रत्नत्रयसम्पन्न है और न सम्यक् चारित्र का आचरण करनेवाला है ।