
सम्यक्त्व-ज्ञान-चारित्र-स्वभाव:परमार्थत: ।
आत्मा रागविनिर्मुक्तो मुक्तिमार्गो विनिर्मल: ॥42॥
अन्वयार्थ : परमार्थत: सम्यक्त्व-ज्ञान-चारित्र-स्वभाव: रागविनिर्मुक्तः विनिर्मलः आत्मा मुक्तिमार्ग: ।
निश्चय की अपेक्षा से सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वभावी रागरहित निर्मल आत्मा ही मोक्षमार्ग है ।