
कर्म-नोकर्म-निर्मुक्तममूर्त जरामरम् ।
निर्विशेषमसंबद्धमात्मानं योगिनो विदु: ॥52॥
अन्वयार्थ : योगिनः आत्मानं कर्म-नोकर्म-निर्मुक्तं अमूर्तं अजर-अमरं निर्विशेषं असंबद्धं विदुः ।
योगीजन आत्मा को द्रव्यकर्मों, भावकर्मों और नोकर्मों से रहित; अमूर्त ; अजर-अमर, सामान्यस्वरूप और सर्वप्रकार के संबंधों एवं बंधनों से रहित तथा स्वाधीन जानते हैं ।