+ ध्येयरूप विविक्तात्मा/शुद्धात्मा का स्वरूप -
कर्म-नोकर्म-निर्मुक्तममूर्त जरामरम् ।
निर्विशेषमसंबद्धमात्मानं योगिनो विदु: ॥52॥
अन्वयार्थ : योगिनः आत्मानं कर्म-नोकर्म-निर्मुक्तं अमूर्तं अजर-अमरं निर्विशेषं असंबद्धं विदुः ।
योगीजन आत्मा को (ज्ञानावरणादि) द्रव्यकर्मों, (राग-द्वेषादि) भावकर्मों और (शरीर आदि) नोकर्मों से रहित; अमूर्त (स्पर्श, रस, गंध, वर्ण से विहीन); अजर-अमर, (गुणभेद से शून्य) सामान्यस्वरूप और सर्वप्रकार के संबंधों एवं बंधनों से रहित तथा स्वाधीन जानते (मानते / बतलाते) हैं ।