
संसारवर्तिनोऽन्योन्यमुपकारं वितन्वते ।
मुक्तास्तद्व्यतिरेकेण न कस्याप्युपकुर्वते ॥75॥
अन्वयार्थ : संसारवर्तिन: अन्योन्यं उपकारं वितन्वते । मुक्ता: तद् व्यतिरेकेण कस्यापि न उपकुर्वते ।
संसारवर्ती/राग-द्वेष विकारों से अथवा आठ कर्मों से सहित जीव परस्पर एक-दूसरे का उपकार करते हैं । मुक्त जीव संसार से भिन्न होने के कारण किसी का भी उपकार नहीं करते हैं ।