
कर्म चेत्कुरुते भावो जीव: कर्ता तदा कथम् ।
न किंचित् कुरुते जीवो हित्वा भावं निजं परम् ॥91॥
अन्वयार्थ : चेत् भावः कर्म कुरूते, तदा जीवः कर्ता कथं जीवः निजभावं हित्वा किंचित् परं न कुरूते ।
यदि यह बात मान ली जाय कि मोह-राग-द्वेषादि विकारी परिणाम ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म का कर्ता है, तो जीव ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मों का कर्ता कैसे हो सकता है? क्योंकि जीव तो अपने ज्ञान-दर्शन आदि निज परिणामों को छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं करता ।