
देह-संहति-संस्थान-गति-जाति-पुरोगमा: ।
विकारा: कर्मजा: सर्वे चैतन्येन विवर्जिता: ॥94॥
अन्वयार्थ : देह-संहति-संस्थान-गति-जाति-पुरोगमा: सर्वे विकारा: कर्मजा: चैतन्येन विवर्जिता: ।
संसारी जीव के संयोग में पाये जानेवाले शरीर, संहनन, संस्थान, गति, जाति आदिरूप जितने भी विकार हैं, वे सर्व नामकर्म के निमित्त से उत्पन्न हुए हैं एवं चेतना रहित हैं ।