
नाचेतने स्तुते देहे स्तुतोऽस्ति ज्ञानलक्षण: ।
न कोशे वर्णिते नूनं सायकस्यास्ति वर्णना ॥100॥
अन्वयार्थ : अचेतने देहे स्तुते ज्ञानलक्षण: स्तुत: न अस्ति यथा कोशे वर्णिते नूनं सायकस्य वर्णना न अस्ति ।
अचेतन देह की स्तुति करने पर जीव की स्तुति नहीं होती; क्योंकि म्यान के सौंदर्य का वर्णन करने से म्यान के भीतर रहनेवाली तलवार का वर्णन नहीं होता ।