
विकारा: सन्ति ये केचिद्राग-द्वेष-मदादय: ।
कर्मजास्तेऽखिला ज्ञेयास्तिग्मांशोरिव मेघजा: ॥105॥
अन्वयार्थ : मेघजा: तिग्म-अंशो: इव केचित् राग-द्वेष-मोहादय: विकारा: सन्ति; ते अखिला: कर्मजा: ज्ञेया: ।
मेघ के निमित्त से उत्पन्न होनेवाले सूर्य के विकार के समान जीव के राग, द्वेष, मद आदि जो कुछ भी विकार भाव हैं, वे सब कर्मजनित हैं; ऐसा जानना चाहिए ।