+ कर्म को जीव का कर्ता मानने पर आपत्ति - -
आत्मानं कुरुते कर्म यदि कर्म तदा कथम् ।
चेतनाय फलं दत्ते भुक्ते वा चेतन: कथम् ॥120॥
अन्वयार्थ : यदि कर्म आत्मानं कुरुते तदा कर्म चेतनाय फलं कथं दत्ते ? वा चेतन: (कर्म-फलं) कथं भुक्ते ?
यदि कर्म (अपने उपादान से) स्वयं को करता है तो फिर कर्म, चेतन-आत्माको फल कैसे देता है? और चेतनात्मा उस फल को कैसे भोगता है? - ये दोनों बातें फिर बनती ही नहीं ।