
कषायस्रोतसागत्य जीवे कर्मावतिष्ठते ।
आगमेनेव पानीयं जाड्य-कारं सरोवरे ॥123॥
अन्वयार्थ : सरोवरे जाड्यकारं पानीयं आगमेन इव कषाय-स्रोतसा कर्म आगत्य जीवे अवतिष्ठते ।
जिसप्रकार सरोवर में स्रोतरूप नाली के द्वारा आकर शीतकारक जल ठहरता है, उसीप्रकार जीव में कषाय स्रोत से आकर जडता-कारक कर्म ठहरता है ।