
कषाया नोपयोगेभ्यो नोपयोगा: कषायत: ।
न मूर्तामूर्तयोरस्ति संभवो हि परस्परम् ॥130॥
अन्वयार्थ : उपयोगेभ्य: कषाया: न । कषायत: उपयोगा: न । नहि मूर्त-अमूर्तयो: परस्परं संभव: अस्ति ।
ज्ञान-दर्शनरूप उपयोग से क्रोधादि कषाय उत्पन्न नहीं होते और कषायों से ज्ञानदर्शनरूप उपयोग उत्पन्न नहीं होते । अमूर्तिक द्रव्य से मूर्तिक द्रव्य उत्पन्न हो और मूर्तिक द्रव्य से अमूर्तिक द्रव्य उत्पन्न हो - ऐसी परस्पर उत्पत्ति संभव ही नहीं है ।