
राग-मत्सर-विद्वेष-लोभ-मोह- मदादिषु ।
हृषीक-कर्म-नोकर्म-रूप-स्पर्श-रसादिषु ॥137॥
एतेऽहमहमेतेषामिति तादात्म्यमात्मन: ।
विमूढ़: कल्पयन्नात्मा स्व-परत्वं न बुध्यते ॥138॥
अन्वयार्थ : विमूढ: आत्मा राग-मत्सर-विद्वेष-लोभ-मोह-मद-आदिषु ह्रषीक-कर्म-नोकर्म-रूप-स्पर्श-रस-आदिषु एते अहं एतेषां अहं इति आत्मन: तादात्म्यं कल्पयन् स्व-परत्वं न बुध्यते ।
मूढ आत्मा जीव राग, द्वेष, ईर्षा, लोभ, मोह, मदादिक में तथा इंद्रिय, कर्म, नोकर्म, रूप, रस, स्पर्शादिक विषयों में - 'ये मैं हूँ और मैं इनका हूँ', इसप्रकार आत्मा के तादात्म्य की कल्पना करता हुआ स्व-पर-विवेक को प्राप्त नहीं होता ।