+ देवेन्द्रों का विषय-सुख भी दुःख ही है - -
यत्सुखं सुरराजानां जायते विषयोद्भवम् ।
ददानं दाहिकां तृष्णां दु:खं तदवबुध्यताम् ॥143॥
अन्वयार्थ : सुरराजानां विषय-उद्भवं यत् सुखं जायते तत् दाहिकां तृष्णां ददानं दु:खं (एव अस्ति इति) अवबुध्यताम् ।
देवेन्द्रों को इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न जो सुख होता है वह दाह उत्पन्न करनेवाली तृष्णा को देनेवाला है; इसलिए उसे (वस्तुतः) दुःख ही समझना चाहिए ।