
रागद्वेषद्वयालीढ: कर्म बध्नाति चेतन: ।
व्यापारं विदधानोऽपि तदपोढ़ो न सर्वथा ॥153॥
अन्वयार्थ : राग-द्वेषद्वयालीढ: चेतन: कर्म बध्नाति तदपोढ: व्यापारं विदधान: अपि न सर्वथा ।
राग-द्वेष-दोनों से सहित चेतन/आत्मा कर्म बांधता है और राग-द्वेष से रहित आत्मा मन-वचन-काय की क्रिया को करता हुआ भी कर्म का बन्ध किंचित् मात्र भी नहीं करता ।