
सर्वव्यापारहीनोऽपि कर्मध्ये व्यवस्थित: ।
रेणुभिर्व्याप्यते चित्रै: स्नेहाभ्यक्ततनुर्यथा ॥156॥
समस्तारम्भ-हीनोऽ पि कर्मध्ये व्यवस्थित: ।
कषायाकुलितस्वान्तो व्याप्यते दुरितैस्तथा ॥157॥
अन्वयार्थ : यथा स्नेह-अभ्यक्त-तनु: कर्मध्ये व्यवस्थित: सर्वव्यापारहीन: अपि चित्रै: रेणुभि: व्याप्यते ।
तथा कषाय-आकुलित-स्वान्त: कर्मध्ये व्यवस्थित: समस्त-आरम्भ-हीन: अपि दुरितै: व्याप्यते ।
जिसप्रकार शरीर में तेलादि की मालिश किया हुआ पुरुष धूलि से व्याप्त कर्मक्षेत्र में बैठा हुआ समस्त व्यापार से हीन होता हुआ अर्थात् कर्मक्षेत्र में स्वयं कुछ काम न करता हुआ भी नाना प्रकार की धूलि से व्याप्त होता है ।
उसीप्रकार जिसका चित्त क्रोधादि कषायों से आकुलित है, वह कर्म के मध्य में स्थित हुआ समस्त आरम्भों से रहित होने पर भी कर्मों से व्याप्त/लिप्त होता है ।