
सरागो बध्यते पापैरभुञ्जानोऽ पि निश्चितम् ।
अभुञ्जाना न किं मत्स्या: श्वभ्रं यान्ति कषायत: ॥167॥
अन्वयार्थ : अभुञ्जाना: मत्स्या: कषायत: किं श्वभ्रं न यान्ति ? अभुञ्जान: अपि सराग: निश्चितं पापै: बध्यते ।
जिसप्रकार स्वयम्भूरमण समुद्र में रहनेवाला तन्दुलमत्स्य न भोगता हुआ भी क्या कषाय से नरक को प्राप्त नहीं होता? उसीप्रकार द्रव्यों को न भोगता हुआ भी भोग में सुख की मान्यता रखनेवाला सरागी सर्व पाप कर्मों के बंध को प्राप्त होता है, यह निश्चित है ।