
परस्याचेतनं गात्रं दृश्यते न तु चेतन: ।
उपकारेऽपकारे क्व रज्यते क्व विरज्यते ॥201॥
अन्वयार्थ : परस्य अचेतनं गात्रं दृश्यते; चेतन: तु न । उपकारे-अपकारे क्व रज्यते क्व विरज्यते ?
दूसरे का जड-शरीर तो दिखाई देता है और चेतन आत्मा तो दिखाई नहीं देता । इसलिए किसी से भी उपकार अथवा अपकार होने पर किस पर राग किया जाय और किस पर द्वेष?