
पश्याम्यचेतनं गात्रं यतो न पुनरात्मन: ।
निग्रहानुग्रहौ तेषां ततोऽ हं विदधे कथम् ॥204॥
अन्वयार्थ : यत: अचेतनं गात्रं पश्यामि,पुन: आत्मन: न , तत: अहं तेषां निग्रह-अनुग्रहौ कथं विदधे ?
क्योंकि मैं उन शत्रु-मित्रादि के अचेतनस्वरूप शरीर को तो देखता हूँ; परन्तु उनकी आत्माओं को देख नहीं पाता, इसलिए मैं उनका अपकार अथवा उपकार कैसे करूँ? अर्थात् मैं किसी का अच्छा अथवा बुरा कर ही नहीं सकता, यह निर्णय है ।