
आत्मन: सकलं बाह्यं शर्माशर्मविधायकम् ।
क्रियते मोहदोषेणापरथा न कदाचन ॥221॥
अन्वयार्थ : मोह-दोषेण सकलं बाह्यं आत्मन: शर्म-अशर्म-विधायकं क्रियते । अपरथा कदाचन न ।
मोहरूपी दोष के कारण ही संपूर्ण बाह्य पदार्थ जीव को सुख-दुःख देने में निमित्त बनते हैं अन्यथा मोहरूपी दोष न हो तो कोई भी बाह्य पदार्थ किसी भी जीव को किंचित् मात्र भी सुख-दुःख देने में निमित्त नहीं होते ।