+ परद्रव्य के गुण-दोषों से जीव को हर्ष-विषाद नहीं - -
नानन्दो वा विषादो वा परे संक्रान्त्यभावत: ।
परदोष-गुणैर्नूनं कदाचित् न विधीयते ॥223॥
अन्वयार्थ : पर-दोष-गुणै: परे संक्रांन्त्यभावत: आनन्द: वा विषाद: वा कदाचित् नूनं न विधीयते ।
पुद्गलादि अन्य द्रव्य के गुण-दोषों से जीव को हर्ष-विषाद (सुख-दुःख) नहीं होते; क्योंकि किसी भी परद्रव्य के गुण अथवा दोषों का जीव द्रव्य में संक्रमण (प्रवेश) ही नहीं होता ।