
पवित्र- दर्शन- ज्ञान- चारित्रमयमुत्तमम् ।
आत्मानं वन्द्यमानस्य वन्दनाकथि कोविदैः ॥239॥
अन्वयार्थ : वन्द्यमानस्य पवित्र-दर्शन-ज्ञान-चारित्रमयं उत्तमं आत्मानं कोविदै: वन्दना अकथि ।
मुनिराज जब पवित्र अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र को प्राप्त शुद्धात्मा को नमस्कार करते हैं, तब उस नमस्कार करनेरूप शुभक्रिया और शुभ परिणाम को विज्ञ/तत्त्वज्ञ पुरुष वन्दना कहते हैं ।