
विज्ञायेति निराकृत्य निवृत्तिं द्रव्यतस्त्रिधा ।
भाव्यं भाव-निवृत्तेन समस्तैनो निषिद्धये ॥248॥
अन्वयार्थ : इति निवृत्तिं विज्ञाय द्रव्यत: त्रिधा निराकृत्य समस्त-एन: निषिद्धये भाव-निवृत्तेन भाव्यम् ।
इसप्रकार द्रव्य-भावरूप दोनों निवृत्ति को अर्थात् त्याग को यथार्थ जानकर और द्रव्य निवृत्ति को मन-वचन-काय से छोड़कर अर्थात् उपादेय न मानकर / हेय मानकर ज्ञानावरणादि समस्त कर्मों को दूर करने के लिये त्रियोगपूर्वक भाव से निवृत्त होना चाहिए ।