
दूरीकृत-कषायस्य विशुद्धध्यानलक्षण: ।
विधत्ते प्रक्रमः साधोः कर्मणां निर्जरां पराम् ॥256॥
अन्वयार्थ : दूरीकृतकषायस्य साधो: विशुद्ध-ध्यान-लक्षण: प्रक्रम: कर्मणां परां निर्जरां विधत्ते ।
जिन मुनिराज ने क्रोधादि कषाय परिणामों को दूर किया है, उन मुनिराज ने विशुद्धध्यानरूप लक्षणवाला प्रक्रम किया है ; इससे ज्ञानावरणादि आठों द्रव्यकर्मों की सर्वोत्तम निर्जरा होती है ।