+ निमित्त के सद्भाव से नैमित्तिक कार्य - -
चैतन्यमात्मनो रूपं तच्च ज्ञानमयं विदुः ।
प्रतिबन्धक-सामर्थ्यान्न स्वकार्ये प्रवर्तते ॥312॥
अन्वयार्थ : आत्मन: रूपं चैतन्यं (अस्ति) तत् च ज्ञानमयं विदु:, (तत् चैतन्यं) प्रतिबन्धक सामर्थ्यात् स्वकार्ये न प्रवर्तते ।
आत्मा का रूप अर्थात् स्वरूप चैतन्य है और वह चैतन्य ज्ञानमय है; तथापि मोहनीय आदि चारों प्रतिबंधक / विरोधक घाति कर्मों के सामर्थ्य से अर्थात् निमित्त से वह चैतन्य अपने केवलज्ञानादि कार्यों में प्रवृत्त नहीं होता ।