
चिन्त्यं चिन्तामणिर्दत्ते कल्पितं कल्पपादपः ।
अविचिन्त्यमसंकल्प्यं विविक्तात्मानुचिन्तितः ॥338॥
अन्वयार्थ : चिन्तामणि: चिन्त्यं दत्ते । कल्पपादप: कल्पितं अनुचिन्तित: विविक्तात्मा अविचिन्त्यं असंकल्प्यं ।
चिंतामणि रत्न के सामने बैठकर जीव जिन वस्तुओं का चिंतन करता है, चिंतामणि रत्न उन वस्तुओं को जीव को देता है और कल्पवृक्ष कल्पित पदार्थों को देता है; परंतु त्रिकाली निज शुद्धात्मा का ध्यान जीव के लिये अचिंत्य और अकल्पित पदार्थों को देता है ।