+ समीचीन साधनों में आदर आवश्यक - -
उपेयस्य यतः प्राप्तिर्जायते सदुपायतः ।
सदुपाये ततः प्राज्ञैर्विधातव्यो महादरः ॥341॥
अन्वयार्थ : यत: उपेयस्य (मोक्षस्य) प्राप्ति: सदुपायत: जायते । तत: प्राज्ञै: सदुपाये महा-आदर: विधातव्य: ।
क्योंकि उपेय अर्थात् मोक्षरूप साध्य की सिद्धि समीचीन साधनों से होती है; इसलिए विद्वानों को समीचीन साधनों अर्थात् सम्यक् उपाय करने में अतिशय आदर रखना चाहिए ।