+ मोही जीवों का स्वरूप - -
आत्म-तत्त्वमजानाना विपर्यास-परायणाः ।
हिताहित-विवेकान्धाः खिद्यन्ते सांप्रतेक्षणाः ॥349॥
अन्वयार्थ : (ये जीवा:) आत्म-तत्त्वं-अजानाना, हित-अहित-विवेकान्धा:, विपर्यास परायणा: (सन्ति ते) सांप्रतेक्षणा: खिद्यन्ते ।
जो जीव निज आत्मतत्त्व को नहीं जानते, हित-अहित के विवेक में अंधे हैं अर्थात् अपने हित-अहित को नहीं पहिचानते, विपरीत आचरण करने में चतुर हैं और वर्तमान दृष्टिवंत अर्थात् स्पर्शादि विषयों का सेवन करने में ही सुख है, ऐसी श्रद्धा रखनेवाले हैं; वे जीव नियम से दुःखी हैं ।