+ निर्ममत्व मुनिराज का स्वरूप - -
उपधौ वसतौ संगे विहारे भोजने जने ।
प्रतिबन्धं न बध्नाति निर्ममत्वमधिष्ठितः ॥370॥
अन्वयार्थ : उपधौ वसतौ संगे विहारे भोजने जने निर्ममत्वं-अधिष्ठित: (योगी) प्रतिबन्धं न बध्नाति ।
आगम से मान्यता प्राप्त पीछी, कमंडलु, शास्त्ररूप धर्म के बाह्य साधनस्वरूप परिग्रह में अथवा देहमात्र परिग्रह में, निर्जन-जंगलस्थित निवासयोग्य गुफादिक आवासस्थान में, कथंचित् परिचित साधर्मी मुनिराजों में, शास्त्रानुसार किये जानेवाले विहारकार्य में, अनुद्दिष्ट सरस-नीरस आहार में, भक्ति करनेवाले भक्तजनों में निर्ममत्त्व को प्राप्त मुनिराज राग (ममत्व) नहीं करते ।