
गुणायेदं सयत्नस्य दोषायेदं प्रमादिनः ।
सुखाय ज्वरहीनस्य दुःखाय ज्वरिणो घृतम् ॥372॥
अन्वयार्थ : ज्वरहीनस्य घृतं सुखाय, ज्वरिण: दु:खाय सयत्नस्य इदं गुणाय, प्रमादिन: इदं दोषाय ।
जिसप्रकार ज्वररहित मनुष्य को घी का सेवन शरीर के लिये सुखदाता सिद्ध होता है और उस ही घी का सेवन ज्वरसहित मनुष्य को दुःख का कारण बन जाता है; उसीप्रकार यत्नाचार से अर्थात् प्रमादरहित होकर किया गया खाना-पीना, लेटना-सोना आदि सब आचरण एक को गुणकारी अर्थात् संवर-निर्जरारूप धर्म का कारण सिद्ध होता है और अयत्नाचार से अर्थात् प्रमादसहित होकर किया गया वही खाना-पीना आदि सब आचरण दूसरे को दुःखकारी अर्थात् आस्रव-बंध का कारण बन जाता है ।