
धर्माय क्रियमाणा सा कल्याणागं मनीषिणाम् ।
तन्निमित्तः पुनर्धर्ः पापाय हतचेतसाम् ॥377॥
अन्वयार्थ : मनीषिणां धर्माय क्रियमाणा सा कल्याणागं । पुन: हतचेतसां तन्निमित्त: धर्म: पापाय ।
जो सम्यग्दृष्टि भेदविज्ञानी विद्वान् साधु हैं, उनकी धर्मप्रभावना अथवा जीवदया करने के अभिप्राय से की गयी उक्त लोकाराधना / लोकानुरंजनरूप क्रिया भी कल्याणकारिणी होती है और मिथ्यादृष्टि / अविवेकी साधु हैं, उनकी विषय-कषाय अथवा अज्ञान के कारण से की गई वही की वही - लोकानुरंजनरूप क्रिया पापबंध का कारण बन जाती है ।