
तुंगारोहणतः पातो यथा तृप्तिर्विषान्नतः ।
यथानर्थोऽवबोधादि-मलिनीकरणे तथा ॥383॥
अन्वयार्थ : यथा तुंगारोहणत: पात: यथा विषान्नत: तृप्ति: अनर्थ: तथा अवबोधादि-मलिनीकरणे ।
जिसप्रकार पर्वत से नीचे गिरना तथा विषमिश्रित भोजन से तृप्ति का अनुभव करना - दोनों महा अनर्थकारी अर्थात् मरण का ही कारण है; उसीप्रकार सम्यग्ज्ञानादि को मलिन अर्थात् दूषित करना अत्यंत अनर्थकारी है अर्थात् दुःखरूप संसार में भटकने का कारण है ।