
पादमुत्क्षिपतः साधोरीर्यासमिति-भागिनः ।
यद्यपि म्रियते सूक्ष्मः शरीरी पाद-योगतः ॥385॥
तथापि तस्य तत्रोक्तो बन्धः सूक्ष्मोऽपि नागमे ।
प्रमाद-त्यागिनो यद्वन्निर्मूर्च्छस्य परिग्रहः ॥386॥
अन्वयार्थ : यद्वत् निर्मूर्च्छस्य परिग्रह: यद्यपि ईर्यासमिति-भागिन: साधो: पादं-उत्क्षिपत: पाद-योगत: सूक्ष्म: शरीरी म्रियते तथापि तत्र आगमे तस्य प्रमाद-त्यागिन: सूक्ष्म: अपि बन्ध: न उक्त: ।
जिसप्रकार मूर्च्छा अर्थात् ममता रहित जीव के परिग्रह पाप नहीं कहा जाता, उसीप्रकार यद्यपि ईर्या समिति से सहित अर्थात् भले प्रकार देख-देखकर सावधानी से चलते हुए योगी के पैर को उठाकर रखते समय कभी-कभी सूक्ष्म जंतु पैर तले आकर मर जाता है; तथापि जिनागम में उस प्रमादत्यागी योगी के उस जीवघात से सूक्ष्म भी बंध का होना नहीं कहा गया है ।