+ चेलखण्ड धारक साधु की स्थिति - -
'सूत्रोक्त' मिति गृह्णानश्चेलखण्डमिति स्फुट् ।
निरालम्बो निरारम्भः संयतो जायते कदा ॥392॥
अन्वयार्थ : (य:) संयत: सूत्रोक्तं इति (मत्वा) चेलखण्डं स्फुटं गृह्णान: निरालम्ब: (च) निरारम्भ: कदा जायते ? (कदा अपि नैव)
जो संयमी अर्थात् मुनिराज 'आगम में कहा है' ऐसा कहकर खण्डवस्त्र / लंगोट आदि बाह्य परिग्रह को स्पष्टतया धारण करते हैं, वे निरालम्ब और निरारम्भ कब हो सकते हैं ?