+ शास्त्र संबंधी आदर का सहेतुक कथन - -
उपदेशं विनाप्यंगी पटीयानर्थकामयोः ।
धर्मे तु न बिना शास्त्रादिति तत्रादरो हितः ॥426॥
अन्वयार्थ : अंगी (संसारी जीव:) अर्थ-कामयो: उपदेशं विना अपि पटीयान् (भवति)(परंतु) धर्मे तु विना शास्त्रादि न (प्रवर्तते) इति तत्र (शास्त्रे) आदर: हित: (भवति)
चतुर्गतिरूप दु:खद संसार में स्थित मनुष्यादि सब जीव अर्थ और काम पुरुषार्थों के साधनों में उपदेश के बिना भी निपुण रहते हैं अर्थात् प्रवृत्ति करते ही हैं, परन्तु धर्म पुरुषार्थ के साधनों में शास्त्र के बिना अनादिकाल से कोई भी जीव प्रवृत्त नहीं होता; इसलिए शास्त्र-संबंधी आदर होना अतिशय हितकारक है ।