
तस्माद्धर्मार्थिभिः शश्वच्छास्त्रे यत्नो विधीयते ।
मोहान्धकारिते लोके शास्त्रं लोक-प्रकाशकम् ॥428॥
अन्वयार्थ : तस्मात् धर्मार्थिभि: शास्त्रे शश्वत्यत्न: विधीयते । मोह-अन्धकारिते लोके शास्त्रं लोक-प्रकाशकं ।
इसलिए जो भव्यात्मा वास्तविकरूप से यथार्थ धर्म के अभिलाषी अर्थात् इच्छुक हैं, वे सदा शास्त्रोपदेश की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हैं । अति दुःखद-मोहरूपी अंधकार से परिपूर्ण व्याप्त जगत में एक शास्त्र ही अनंत जीवों को यथार्थ उपाय दिखानेवाले दीपक के समान प्रकाशक / मार्गदर्शक है ।