यतः समेऽप्यनुष्ठाने फलभेदोऽभिसन्धितः ।
स ततः परमस्तत्र ज्ञेयो नीरं कृषाविव ॥435॥
बहुधा भिद्यते सोऽपि रागद्वेषादिभेदतः ।
नानाफलोपभोक्तृणां नृणां बुद्ध्यादिभेदतः ॥436॥
अन्वयार्थ : यत: समे अनुष्ठाने (सति) अपि कृषौ नीरं (परम:) इव (परिणामत:) फलभेद: अभिसन्धित: (भवति) । तत: तत्र (फलप्राप्तौ) स: (परिणाम:) परम: ज्ञेय: । स: (परिणाम:) अपि राग-द्वेषादि भेदत: (तथा) नानाफलोपभोक्तृणां नृणां बुद्ध्यादिभेदत: बहुधा भिद्यते ।
जिसप्रकार खेती में जोतने-बीज बोने आदि रूप बाह्य कार्य समान होने पर भी उस खेत में दिये जानेवाले जल को विशेष स्थान प्राप्त है अर्थात् जल समय पर एवं आवश्यक मात्रा में देने न देने के कारण फसलरूप फल अर्थात् कार्य हीनाधिक होता है । उसीप्रकार पुण्य-पापरूप बाह्य-क्रिया/कार्य समान होने पर भी जीव के हीनाधिक शुभाशुभ परिणाम के अनुसार कर्म-फल में भेद होता है । इसलिए कर्म-फल की प्राप्ति में जीव के परिणाम / अभिप्राय को मुख्य स्थान प्राप्त है । वह जीव का अभिप्राय भी राग-द्वेषादि के भेद से तथा कर्म-फल का उपभोग करनेवाले विविध मनुष्यों की बुद्धि आदि के भेद से अनेक प्रकार का है ।