
रागादयः परीणामाः कल्मषोपाधिसंभवाः ।
जीवस्य स्फटिकस्येव पुष्पोपाधिभवा मताः ॥494॥
अन्वयार्थ : पुष्पोपाधिभवा: स्फटिकस्य इव जीवस्य रागादय: परीणामा: कल्मषोपाधिसंभवा: मता: ।
जिसप्रकार पुष्पों की उपाधि/निमित्त से स्फटिक के अनेक प्रकार के रंगादिरूप परिणाम / अवस्थाएँ होती हैं; उसीप्रकार मोहनीयकर्म के निमित्त से जीव के क्रोध-मान-मायालोभादिरूप रागादि परिणाम होते हैं ।