
देहात्मनोः सदा भेदो भिन्नज्ञानोपलम्भतः ।
इन्द्रियैर्ज्ञायते देहो नूनमात्मा स्वसंविदा ॥504॥
अन्वयार्थ : भिन्नज्ञानोपलम्भत: देह-आत्मनो: सदा भेद: । देह: इन्द्रियै: आत्मा नूनं स्वसंविदा ।
भिन्न-भिन्न ज्ञानों से उपलब्ध अर्थात् ज्ञात होने के कारण शरीर और आत्मा में सदा परस्पर भेद है । शरीर, इंद्रियों से अर्थात् इंद्रिय-निमित्तक मतिज्ञान से जाना जाता है और आत्मा निश्चय ही स्वसंवेदनज्ञान से जानने में आता है ।