
देहचेतनयोर्भेदो दृश्यते येन तत्त्वतः ।
न संगे जायते तस्य विषयेषु कदाचन ॥517॥
अन्वयार्थ : येन तत्त्वत: देहचेतनयो: भेद: दृश्यते, तस्य विषयेषु कदाचन संगे: न जायते ।
जिस जीव ने अनित्य एवं अचेतन देह और सुखस्वभावी एवं चेतन आत्मा में भेद तत्त्वतः अर्थात् वास्तविक रीति से देख/जान लिया है - अनुभव में लिया है, उस जीव का पंचेंद्रियों के स्पर्शादि विषयों में संग अर्थात् आसक्तभाव कभी भी नहीं होता - विरक्तभाव ही रहता है ।