
सर्वार्थसिद्धि :
जिस प्रकार तालाब में जल लाने का दरवाजा जल के आने का कारण होने से आस्रव कहलाता है उसी प्रकार आत्मा के साथ बंधने के लिए कर्म योग-रूपी नाली के द्वारा आते हैं, इसलिए योग आस्रव संज्ञा को प्राप्त होता है । कर्म दो प्रकार का है -- पुण्य और पाप, इसलिए क्या योग सामान्य-रूप से उसके आस्रव का कारण है या कोई विशेषता है ? इसी बात के बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं – |
राजवार्तिक :
1-3. 'कायवाङ्मनस्कर्मास्रवः' इतना लघुसूत्र बनाने में योगशब्द आगम में प्रसिद्ध है उसका अर्थ अव्याख्यात ही रह जायगा । 'कामवाङ्मनस्कर्म योग आस्रवः' ऐसा एक सूत्र बनाने से यद्यपि 'स' शब्द को ग्रहण नहीं करना पड़ता और एकयोग होने से लाघव हो सकता है परन्तु इस से सभी योगों में आस्रवत्व का प्रसंग प्राप्त होता है - केवली के समुद्घात के समय होनेवाले दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूर्ण योग भी आस्रव हो जायँगे । यद्यपि इस काल में सूक्ष्मयोग मानकर तन्निमित्तक अल्पबंध माना जाता है पर इससे तो उनमें साधारण योगत्व और बहुबन्ध का प्रसंग प्राप्त होता है । वस्तुतः मुख्य योग तो वर्गणा-निमित्तक प्रदेशपरिस्पन्द रूप है और वही आस्रव है, पर केवलिसमुद्भात वर्गणालम्बन नहीं है अतः उसे आस्रव नहीं मानते । दण्डादिव्यापार काल में अनास्रव होने से दण्डादियोगनिमित्तक बन्ध भी नहीं होता। हाँ, उस समय जो कायवर्गणालम्बन सूक्ष्म काययोग होता है उसी से बन्ध होता है। यदि एकसूत्र बनाया जाता तो सभी योग आस्रव बन जाते । भिन्न सूत्र बनाने से यह स्पष्ट अर्थ निकल आता है कि--- जो काय वचन मनोवर्गणालम्बन प्रदेश परिस्पन्द है वही योग और आस्रव है, अन्य नहीं। अर्थात्.ऐसा भी योग है जो आस्रव नहीं होता। जैसे केवली के इन्द्रियाँ विद्यमान रहती हैं, पर तत्पूर्वक व्यापार नहीं होने से इन्द्रियजकर्मबन्ध नहीं होता उसी तरह दण्डादि योग के रहनेपर भी कर्मबन्ध नहीं होता अतः इसे आस्रव नहीं कहते। 4-5. जैसे जलागमन द्वार से जल आता है उसी तरह योगप्रणाली से आत्मा में कर्म आते हैं अतः इस योग को आस्रव कहते हैं । जैसे गोला कपड़ा वायु के द्वारा लाई गई धूलि को चारों ओर से चिपटा लेता है उसी तरह कषायरूपी जल से गीला आत्मा योग के द्वारा लाई गई करता है। अथवा जैसे गरम लोहपिण्ड यदि पानी डाला जाय तो वह चारों तरफ से पानी को खींचता है उसी तरह कषाय से सन्तप्त जीव योग से लाये गये कर्मो को सब ओर से ग्रहण करता है। |